Erdogan ने UN में फिर उठाया कश्मीर मुद्दा, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान का समर्थन कर चुका है तुर्की
तुर्की के राष्ट्रपति Recep Tayyip Erdogan ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से कश्मीर का मुद्दा उठाया है. 22 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में अपने संबोधन के दौरान एर्दोगन ने कहा कि दक्षिण एशिया में कश्मीर समेत सभी विवादों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर और संबंधित प्रस्तावों के तहत बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए.
एर्दोगन का यह बयान भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नई दिल्ली लगातार स्पष्ट करती रही है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और भारत-पाकिस्तान के बीच किसी भी मुद्दे का समाधान द्विपक्षीय तरीके से होना चाहिए. भारत कश्मीर मामले में किसी तीसरे देश की मध्यस्थता को स्वीकार नहीं करता.
कश्मीर पर Erdogan का पुराना रुख, लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद संदर्भ और महत्वपूर्ण
एर्दोगन का कश्मीर का जिक्र पहली बार नहीं है. तुर्की के राष्ट्रपति पहले भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठा चुके हैं. लेकिन उनके ताजा बयान को मई 2025 में हुए भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव और ऑपरेशन सिंदूर की पृष्ठभूमि में भी देखना महत्वपूर्ण है.
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की ओर से भारत के खिलाफ बड़ी संख्या में ड्रोन भेजे गए थे. 9 मई 2025 को भारत के विदेश मंत्रालय की आधिकारिक ब्रीफिंग में बताया गया था कि अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर लगभग 300 से 400 ड्रोन के जरिए 36 स्थानों पर घुसपैठ की कोशिश की गई. भारतीय अधिकारियों ने ड्रोन के मलबे की प्रारंभिक जांच के आधार पर कुछ ड्रोन को तुर्की की कंपनी असिसगार्ड के Songar सिस्टम से संबंधित बताया था.
बाद की रिपोर्टों में भी पाकिस्तान के पास तुर्की मूल के ड्रोन और तुर्की की रक्षा कंपनियों के साथ उसके सहयोग का उल्लेख सामने आया. Reuters ने मई 2025 की अपनी रिपोर्ट में बताया था कि पाकिस्तान ने तुर्की मूल के YIHA-III और Asisguard Songar ड्रोन का इस्तेमाल किया था और पाकिस्तान की तुर्की के साथ ड्रोन सहयोग की व्यवस्था पहले से मौजूद थी.
तुर्की ने पाकिस्तान का समर्थन किया, भारत ने जताई चिंता
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की सरकार ने पाकिस्तान के पक्ष में कई सार्वजनिक बयान दिए थे. 7 मई 2025 को तुर्की के विदेश मंत्रालय ने भारत की सैन्य कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा था कि इससे व्यापक युद्ध का खतरा पैदा हो सकता है और पाकिस्तान की जांच की मांग का समर्थन किया था.
इसी दौरान राष्ट्रपति एर्दोगन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से फोन पर बातचीत की और पाकिस्तान के प्रति तुर्की की एकजुटता व्यक्त की. पाकिस्तान ने भी तुर्की के समर्थन को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया. 3 मई 2025 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि शहबाज शरीफ ने तुर्की के समर्थन की सराहना की और इसे दोनों देशों के ऐतिहासिक तथा गहरे संबंधों का प्रतिबिंब बताया था.
भारत सरकार ने भी उस समय तुर्की की भूमिका को लेकर चिंता जताई थी. विदेश मंत्रालय ने कहा था कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर से पहले और उसके दौरान तुर्की के पाकिस्तान को दिए गए समर्थन, जिसमें राजनयिक और रक्षा सहायता शामिल थी, का संज्ञान लिया है.

तुर्की-पाकिस्तान की रक्षा साझेदारी भी बनी हुई है
तुर्की और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग केवल ऑपरेशन सिंदूर तक सीमित नहीं है. दोनों देशों के बीच ड्रोन, रक्षा तकनीक और सैन्य सहयोग पहले से मौजूद है. पाकिस्तान तुर्की की रक्षा कंपनी Baykar के साथ सहयोग कर रहा है और YIHA-III ड्रोन की स्थानीय असेंबली से जुड़ा सहयोग भी सामने आया है.
इस संबंध की रणनीतिक अहमियत 2026 में भी बढ़ी है. 7 अगस्त 2026 को तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब ने एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए. तुर्की के राष्ट्रपति कार्यालय के अनुसार, समझौते का उद्देश्य तीनों देशों के बीच सामूहिक सुरक्षा और रक्षा सहयोग को मजबूत करना है. समझौते में किसी एक देश पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माने जाने का प्रावधान भी शामिल है.
इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र महासभा के मौजूदा सत्र के दौरान 21 सितंबर को तुर्की, पाकिस्तान, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्रियों की बैठक भी हुई. चारों देशों ने क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर समन्वय जारी रखने की बात कही.
ऐसे में कश्मीर पर Erdogan के बयान को कैसे देखा जाए?
एर्दोगन के ताजा बयान को केवल एक सामान्य शांति अपील के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता. एक तरफ तुर्की कश्मीर पर बातचीत और संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ तुर्की और पाकिस्तान के बीच रक्षा और रणनीतिक सहयोग लगातार गहरा हुआ है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी तुर्की ने पाकिस्तान के प्रति खुला राजनयिक समर्थन जताया था और भारत ने तुर्की की रक्षा सहायता को लेकर अपनी चिंता दर्ज कराई थी.
इसलिए भारत के नजरिए से एर्दोगन का ताजा बयान महत्वपूर्ण है. नई दिल्ली के लिए सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि तुर्की कश्मीर पर क्या कह रहा है, बल्कि यह भी है कि कश्मीर पर टिप्पणी करने वाला देश भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव के दौरान किस पक्ष के साथ खड़ा रहा है और उसके पाकिस्तान के साथ कितने गहरे रक्षा संबंध हैं.
इतना स्पष्ट है कि कश्मीर पर तुर्की का रुख नया नहीं है और यह रुख तुर्की-पाकिस्तान के लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक तथा रक्षा संबंधों की व्यापक पृष्ठभूमि में सामने आता रहा है.
भारत की स्थिति इसके विपरीत लगातार स्पष्ट रही है. जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और भारत-पाकिस्तान से जुड़े मुद्दों को दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय तरीके से सुलझाया जाना चाहिए. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र के मंच से एर्दोगन का कश्मीर का फिर से उल्लेख भारत और तुर्की के रुख में अंतर को एक बार फिर सामने लाता है.
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