T-72 और T-90 टैंकों के लिए ₹586 करोड़ में खरीदी जाएंगी स्वदेशी सहायक विद्युत इकाइयां, रक्षा मंत्रालय ने किया अनुबंध

टी-72 और टी-90 टैंकों के लिए 586 करोड़ रुपये की स्वदेशी APU खरीद, रक्षा मंत्रालय ने किया अनुबंध

भारत सरकार ने भारतीय सेना के T-72 और T-90 टैंकों की परिचालन क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाया है. रक्षा मंत्रालय ने इन टैंकों के लिए स्वदेशी सहायक विद्युत इकाइयों (APU) की खरीद के लिए एक्यूरेट इंडस्ट्रियल कंट्रोल्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ 586 करोड़ रुपये का अनुबंध किया है. अनुबंध पर 21 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की उपस्थिति में हस्ताक्षर किए गए.

टैंक के महत्वपूर्ण सिस्टम को मिलेगी वैकल्पिक बिजली

सहायक विद्युत इकाई यानी APU टैंक के भीतर मौजूद कई महत्वपूर्ण प्रणालियों को विद्युत शक्ति उपलब्ध कराने के लिए वैकल्पिक स्रोत के रूप में काम करती है. इनमें फायर कंट्रोल सिस्टम, फायरिंग सर्किट और गन स्टेबिलाइजेशन सिस्टम के साथ-साथ अन्य सहायक उपकरण शामिल हैं.

स्वदेशी APU को टी-72 और टी-90 टैंकों में शामिल किए जाने से भारतीय सेना की मशीनीकृत इकाइयों की संचालन तत्परता, विश्वसनीयता और स्थायित्व को मजबूत करने में मदद मिलेगी. इससे इन बख्तरबंद प्लेटफॉर्मों के महत्वपूर्ण उप-प्रणालियों के लिए स्वदेशी समाधान को बढ़ावा मिलेगा.

मेक-II के तहत उद्योग की भागीदारी

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह खरीद बख्तरबंद प्लेटफॉर्मों के महत्वपूर्ण उप-प्रणालियों के स्वदेशीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. यह परियोजना उद्योग के नेतृत्व में किए गए अनुसंधान और विकास के लिए मेक-II प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाई गई है.

मंत्रालय ने कहा कि यह अनुबंध स्वदेशी तकनीक और नवाचार को विकसित करने के बाद उसे उत्पादन तथा वास्तविक उपयोग में शामिल करने की प्रक्रिया को भी दर्शाता है. इससे रक्षा क्षेत्र में निजी उद्योग की तकनीकी और विनिर्माण क्षमता को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.

आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग पर जोर

586 करोड़ रुपये का यह अनुबंध रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की सरकार की व्यापक नीति के अनुरूप है. रक्षा मंत्रालय ने इसे ‘विकसित भारत @2047’ के विजन से जुड़ी उपलब्धि बताया है.

इस पहल का उद्देश्य महत्वपूर्ण रक्षा प्रणालियों और उनके उप-प्रणालियों के लिए घरेलू तकनीक एवं विनिर्माण क्षमता को मजबूत करना है, जिससे भारतीय रक्षा उद्योग को अधिक आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में आगे बढ़ा जा सके.

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