Global Military Spending 2025: 2.9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचा रक्षा खर्च, किन देशों ने सबसे ज्यादा खर्च किया

2025 में 2.9 ट्रिलियन डॉलर का सैन्य खर्च: क्या दुनिया नए हथियारों की दौड़ में फंस चुकी है?

साल 2025… दुनिया के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट बन चुका है. जहाँ एक तरफ कूटनीति की बातें हो रही हैं… वहीं दूसरी तरफ देश हथियारों पर रिकॉर्ड पैसा खर्च कर रहे हैं.

करीब 2.9 ट्रिलियन डॉलर— जी हाँ, इतना पैसा सिर्फ एक साल में रक्षा बजट पर खर्च किया गया है. तो क्या दुनिया एक नए हथियारों की दौड़ में फंस चुकी है? क्या ये तीसरे विश्व युद्ध की तैयारी है?

देखिए हमारी ये खास रिपोर्ट…

Stockholm International Peace Research Institute द्वारा जारी नवीनतम ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में वैश्विक सैन्य खर्च बढ़कर 2,887 बिलियन डॉलर (लगभग 2.9 ट्रिलियन डॉलर) तक पहुँच गया है. यह लगातार 11वां साल है जब दुनिया में सैन्य खर्च बढ़ा है.

जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अब कूटनीति के बजाय सैन्य शक्ति को अपनी सुरक्षा का प्राथमिक आधार मान रहा है . यद्यपि 2025 में 2.9 प्रतिशत की वास्तविक वृद्धि दर 2024 की 9.7 प्रतिशत की वृद्धि की तुलना में कम प्रतीत होती है, लेकिन यह मंदी केवल अमेरिकी सहायता तंत्र में आए बदलावों का परिणाम है, न कि वैश्विक तनाव में किसी कमी का . यदि संयुक्त राज्य अमेरिका के आंकड़ों को अलग कर दिया जाए, तो शेष विश्व के सैन्य खर्च में 9.2 प्रतिशत की भारी वृद्धि देखी गई है, जो विशेष रूप से यूरोप और एशिया में बढ़ते सुरक्षा खतरों को रेखांकित करती है .

वैश्विक सैन्य बोझ (Global Military Burden), जिसे सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के हिस्से के रूप में सैन्य व्यय के रूप में परिभाषित किया जाता है, 2025 में बढ़कर 2.5 प्रतिशत हो गया है, जो 2009 के बाद का उच्चतम स्तर है . यह वृद्धि दर्शाती है कि राष्ट्र अपने आर्थिक संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक विकास के बजाय युद्ध की तैयारियों और शस्त्रीकरण में झोंक रहे हैं . सैन्य खर्च का यह केंद्रीकरण विशेष रूप से दुनिया के शीर्ष पांच देशों—संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, रूस, जर्मनी और भारत—के बीच केंद्रित है, जो कुल वैश्विक खर्च का 58 प्रतिशत हिस्सा कवर करते हैं 。

2025 में संयुक्त राज्य अमेरिका का सैन्य खर्च 954 बिलियन डॉलर रहा

2025 में संयुक्त राज्य अमेरिका का सैन्य खर्च 954 बिलियन डॉलर रहा, जो दुनिया में सबसे अधिक है, लेकिन पिछले वर्ष की तुलना में इसमें 7.5 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है . सिपरी के विश्लेषण के अनुसार, इस गिरावट का मुख्य कारण यूक्रेन के लिए किसी भी नई वित्तीय सैन्य सहायता पैकेज को मंजूरी न मिलना है . पिछले तीन वर्षों में अमेरिका ने यूक्रेन के लिए कुल 127 बिलियन डॉलर की सहायता दी थी, जिसकी अनुपस्थिति ने आंकड़ों में कमी दिखाई है . हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट अल्पकालिक है. अमेरिकी कांग्रेस ने 2026 के लिए पहले ही 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के बजट को मंजूरी दे दी है, और राष्ट्रपति ट्रम्प के नवीनतम प्रस्ताव के अनुसार 2027 तक यह आंकड़ा 1.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है .

भले ही यूक्रेन को दी जाने वाली सहायता में कमी आई हो, लेकिन अमेरिका ने अपनी आंतरिक रक्षा प्राथमिकताओं को “इंडो-पैसिफिक” और “पश्चिमी गोलार्ध” में प्रभुत्व बनाए रखने की ओर मोड़ दिया है . नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के तहत, परमाणु हथियारों के आधुनिकीकरण और पारंपरिक सैन्य क्षमताओं में निवेश को प्राथमिकता दी गई है ताकि चीन के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित किया जा सके . इसके अतिरिक्त, 2026 के पूर्वानुमानों में अमेरिका-ईरान संघर्ष की संभावनाओं ने सैन्य खर्च में एक और बड़ी उछाल की नींव रख दी है .

चीन और एशिया-ओशिनिया: शस्त्रीकरण की निरंतरता

एशिया और ओशिनिया क्षेत्र ने 2025 में सैन्य खर्च में 8.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है, जो 2009 के बाद की सबसे तेज वार्षिक वृद्धि है . चीन, जो विश्व का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश है, ने अपने रक्षा बजट में 7.4 प्रतिशत की वृद्धि की है, जो अनुमानित रूप से 336 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया है . चीन का सैन्य खर्च लगातार 31 वर्षों से बढ़ रहा है, जो उसकी दीर्घकालिक सैन्य आधुनिकीकरण की योजना और वैश्विक शक्ति बनने की आकांक्षा को दर्शाता है . महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन के सैन्य खरीद विभाग में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के बावजूद, उसके सैन्य खर्च पर कोई अंकुश नहीं लगा है .

चीन की इस सैन्य मजबूती ने उसके पड़ोसियों को भी सुरक्षा चिंता में डाल दिया है. जापान ने 2025 में अपने सैन्य खर्च में 9.7 प्रतिशत की वृद्धि की है, जो 62.2 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया है . यह जापान की GDP का 1.4 प्रतिशत है, जो 1958 के बाद का सबसे उच्च स्तर है . इसी तरह, ताइवान ने अपने सैन्य खर्च में 14 प्रतिशत की वृद्धि की है (18.2 बिलियन डॉलर), जो 1988 के बाद की सबसे बड़ी वृद्धि है . यह वृद्धि ताइवान के आसपास चीनी सैन्य अभ्यासों की बढ़ती तीव्रता का सीधा प्रत्युत्तर है .

दक्षिण एशिया: “ऑपरेशन सिंदूर” और भारत-पाकिस्तान प्रतिद्वंद्विता

दक्षिण एशिया में 2025 की सबसे बड़ी सुरक्षा घटना मई में हुआ भारत और पाकिस्तान के बीच का सैन्य संघर्ष था, जिसे भारत ने “ऑपरेशन सिंदूर” का नाम दिया . यह संघर्ष मई 2025 के पहले सप्ताह में पहलगाम में हुए एक आतंकवादी हमले के बाद शुरू हुआ, जिसमें भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकवादी ठिकानों पर “सर्जिकल स्ट्राइक” से भी कहीं अधिक व्यापक कार्रवाई की . 88 घंटों तक चले इस गहन संघर्ष ने दोनों देशों के सैन्य खर्च के ढांचे को बदल दिया है.

भारत का सैन्य खर्च 2025 में 8.9 प्रतिशत बढ़कर 92.1 बिलियन डॉलर हो गया, जिससे वह दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश बन गया है . सिपरी की रिपोर्ट के अनुसार, इस वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा “ऑपरेशन सिंदूर” के दौरान और उसके बाद की गई आपातकालीन खरीद (Emergency Procurements) से जुड़ा है. भारत ने ड्रोन, काउंटर-ड्रोन सिस्टम और उन्नत हवाई रक्षा प्रणालियों में भारी निवेश किया है. भारत की रणनीतिक सफलता में स्वदेशी तकनीक जैसे आकाश मिसाइल प्रणाली और ब्रह्मोस के एकीकरण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई .

दूसरी ओर, पाकिस्तान ने भी अपने सैन्य खर्च में 11 प्रतिशत की वृद्धि की है, जो 11.9 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया है . हालांकि भारत का खर्च पाकिस्तान से लगभग आठ गुना अधिक है, लेकिन पाकिस्तान की वृद्धि दर उसके द्वारा चीन से खरीदे गए नए विमानों और मिसाइलों के भुगतान और संघर्ष के दौरान हुए नुकसान की भरपाई के कारण अधिक रही . सिपरी ने नोट किया है कि पाकिस्तान के सैन्य अभियानों में “चीनी सैन्य सॉफ्टवेर” और रणनीतिक सहयोग (Battlefield Collusion) का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा गया, जो इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है 。

यूरोप: शीत युद्ध के बाद का सबसे बड़ा पुन:शस्त्रीकरण

यूरोप 2025 में वैश्विक सैन्य खर्च में वृद्धि का मुख्य केंद्र रहा, जहाँ क्षेत्रीय खर्च 14 प्रतिशत बढ़कर 864 बिलियन डॉलर हो गया . यूक्रेन युद्ध के चौथे वर्ष में प्रवेश करने के साथ ही, मध्य और पश्चिमी यूरोप के देशों में “डर” और “तैयारी” का ऐसा माहौल बना है जैसा शीत युद्ध की समाप्ति के बाद कभी नहीं देखा गया . रूस के संभावित आक्रमण की आशंकाओं ने यूरोपीय देशों को अपनी सैन्य आत्मनिर्भरता और रक्षा क्षमताओं को अभूतपूर्व स्तर पर बढ़ाने के लिए मजबूर किया है .

जर्मनी इस समूह में सबसे अग्रणी रहा, जिसके सैन्य खर्च में 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह 114 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया . जर्मनी ने अपनी GDP का 2.3 प्रतिशत रक्षा पर खर्च किया, जो 1990 के बाद पहली बार 2 प्रतिशत की सीमा को पार कर गया है . इसी तरह, स्पेन ने 50 प्रतिशत की भारी वृद्धि (40.2 बिलियन डॉलर) दर्ज की, जबकि पोलैंड ने अपनी GDP का 4.5 प्रतिशत सैन्य खर्च के लिए आवंटित किया, जो नाटो सदस्यों के बीच सबसे अधिक सैन्य बोझ है .

रूस और यूक्रेन: युद्ध आधारित अर्थव्यवस्थाएं

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध ने दोनों देशों को “युद्ध आधारित अर्थव्यवस्थाओं” में बदल दिया है. रूस का सैन्य खर्च 2025 में 5.9 प्रतिशत बढ़कर 190 बिलियन डॉलर होने का अनुमान है . यह रूस की GDP का 7.5 प्रतिशत और उसके कुल सरकारी खर्च का रिकॉर्ड 20 प्रतिशत है . यद्यपि यह वृद्धि दर यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद की सबसे धीमी दर है, लेकिन यह अभी भी रूसी समाज पर सैन्यीकरण के गहरे प्रभाव को दर्शाती है .

यूक्रेन, जो वर्तमान में अपनी क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा कर रहा है, ने 2025 में अपने सैन्य खर्च को 20 प्रतिशत बढ़ाकर 84.1 बिलियन डॉलर कर दिया है . यह यूक्रेन की GDP का अविश्वसनीय रूप से 40 प्रतिशत हिस्सा है और कुल सरकारी खर्च का 63 प्रतिशत है . यूक्रेन की सैन्य क्षमता अब काफी हद तक ड्रोन युद्ध और स्वदेशी रक्षा उद्योग पर निर्भर है, जिसमें उसने युद्ध के दौरान महारत हासिल की है .

नाटो का नया लक्ष्य और “क्रिएटिव अकाउंटिंग” का खतरा

जून 2025 में द हेग में हुए नाटो शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए 2035 तक रक्षा खर्च के लक्ष्य को GDP के 5 प्रतिशत तक बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई . इस लक्ष्य के दो मुख्य भाग हैं: 3.5 प्रतिशत “कोर डिफेंस” (सैनिक और हथियार) के लिए और 1.5 प्रतिशत “सुरक्षा संबंधी बुनियादी ढांचे” (नागरिक तैयारियों और अनुसंधान) के लिए . यह नया मानदंड पूर्व के 2 प्रतिशत के लक्ष्य से कहीं अधिक महत्वाकांक्षी है और यूरोप पर अमेरिकी दबाव और बदलती सुरक्षा स्थितियों का परिणाम है .

हालांकि, सिपरी के शोधकर्ताओं ने इस नए लक्ष्य से जुड़ी “पारदर्शिता की कमी” पर चिंता जताई है. विशेषज्ञों का कहना है कि 5 प्रतिशत के इस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश “क्रिएटिव अकाउंटिंग” (Creative Accounting) का सहारा ले सकते हैं, जहाँ गैर-सैन्य खर्चों को भी रक्षा खर्च के रूप में दिखाया जा सकता है . उदाहरण के तौर पर, इटली द्वारा सिसिली के लिए एक पुल के निर्माण को सैन्य महत्व का बताकर रक्षा बजट में शामिल करने का प्रयास इसी प्रवृत्ति को दर्शाता है . शोधकर्ताओं का तर्क है कि इससे किसी देश की वास्तविक सैन्य क्षमता का आकलन करना और भी कठिन हो जाएगा .

मध्य पूर्व और अफ्रीका: संघर्ष और अस्थिरता के बीच सैन्य रुझान

मध्य पूर्व में 2025 के दौरान सैन्य खर्च लगभग स्थिर रहा, जो 0.1 प्रतिशत की मामूली वृद्धि के साथ 218 बिलियन डॉलर रहा . इजरायल का सैन्य खर्च 2025 में 4.9 प्रतिशत घटकर 48.3 बिलियन डॉलर रहा, जिसका मुख्य कारण जनवरी 2025 में हमास के साथ हुए युद्धविराम के बाद युद्ध की तीव्रता में कमी आना था . हालांकि, यह खर्च अभी भी 2022 के स्तर से 97 प्रतिशत अधिक है, जो हमास और हिजबुल्लाह के साथ लंबे समय तक चले संघर्षों के वित्तीय बोझ को दर्शाता है .

ईरान ने भी अपने वास्तविक सैन्य खर्च में 5.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की है, जिसका कारण 40 प्रतिशत से अधिक की उच्च मुद्रास्फीति रही, जिसने सरकार की क्रय शक्ति को कम कर दिया . फिर भी, ईरान ने अपने घरेलू मिसाइल और ड्रोन उत्पादकों, जैसे ‘हेसा’ (HESA), के लिए आवंटन में 50 प्रतिशत तक की वृद्धि की है, जो उसके रणनीतिक निर्यात और क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखने की प्राथमिकता को दर्शाता है .

अफ्रीका में कुल सैन्य खर्च 8.5 प्रतिशत बढ़कर 58.2 बिलियन डॉलर हो गया . नाइजीरिया में 55 प्रतिशत की वृद्धि (2.1 बिलियन डॉलर) देखी गई, जिसका मुख्य कारण देश के विभिन्न हिस्सों में जारी उग्रवाद और चरमपंथी हिंसा से निपटना है . दक्षिण अमेरिका में गुयाना और वेनेजुएला के बीच एसेकिबो क्षेत्र को लेकर बढ़ते तनाव ने गुयाना के सैन्य खर्च में 16 प्रतिशत की वृद्धि की है .

उभरती तकनीकें और भविष्य की सुरक्षा चुनौतियां

2025 के सैन्य रुझान केवल धन के बारे में नहीं हैं, बल्कि युद्ध के तरीकों में आए क्रांतिकारी बदलावों के बारे में भी हैं. सिपरी की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया अब “क्वालिटेटिव परमाणु हथियारों की दौड़” (Qualitative Nuclear Arms Race) की ओर बढ़ रही है, जहाँ साइबर स्पेस, आउटर स्पेस और समुद्र की गहराइयों में तकनीकी श्रेष्ठता हासिल करना प्राथमिकता बन गई है . कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और स्वायत्त हथियार प्रणालियों का एकीकरण अब केवल अनुसंधान तक सीमित नहीं है, बल्कि “ऑपरेशन सिंदूर” जैसे संघर्षों में इनका वास्तविक युद्धक्षेत्र में सफल उपयोग देखा गया है .

विशेष रूप से, “स्पेस-न्यूक्लियर नेक्सस” (Space-Nuclear Nexus) एक नया रणनीतिक जोखिम बनकर उभरा है. आधुनिक परमाणु निवारण अब शुरुआती चेतावनी और संचार के लिए अंतरिक्ष आधारित संपत्तियों पर अत्यधिक निर्भर है, जो अंतरिक्ष में बढ़ते शस्त्रीकरण को और अधिक खतरनाक बनाता है . इन जटिलताओं के बीच, रूस, चीन और अमेरिका के बीच किसी भी नए परमाणु नियंत्रण समझौते की अनुपस्थिति दुनिया को शीत युद्ध से भी अधिक जटिल और जोखिम भरे सुरक्षा वातावरण की ओर ले जा रही है .

निष्कर्ष: एक निरंतर बढ़ते शस्त्रीकरण का भविष्य

सिपरी के 2025 के आंकड़े एक ऐसी दुनिया की तस्वीर पेश करते हैं जो सुरक्षा की तलाश में हथियारों की होड़ में डूबी हुई है. 2,887 बिलियन डॉलर का यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि दुनिया भर के नीति निर्माताओं के बीच बढ़ते अविश्वास और असुरक्षा का प्रतिबिंब है . “ऑपरेशन सिंदूर” जैसी घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक तकनीक और सटीक मारक क्षमता किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष के स्वरूप को कुछ ही घंटों में बदल सकती है .

आने वाले वर्षों (2026-27) के लिए अनुमान बताते हैं कि सैन्य खर्च में यह वृद्धि जारी रहेगी. अमेरिका का ईरान के साथ संभावित संघर्ष और नाटो के नए 5 प्रतिशत के लक्ष्य यूरोपीय और अमेरिकी बजटों को और ऊपर ले जाएंगे . जबकि सैन्य खर्च में यह वृद्धि रक्षा उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा कर रही है, यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों पर भी भारी बोझ डाल रही है . सिपरी के विशेषज्ञों की चेतावनी है कि पारदर्शिता में कमी और “क्रिएटिव अकाउंटिंग” के कारण अब यह समझना और भी कठिन हो जाएगा कि दुनिया कितनी सुरक्षित है या हम कितनी बड़ी तबाही की ओर बढ़ रहे हैं .

अंततः, 2025 का सैन्य खर्च डेटा यह संदेश देता है कि कूटनीति का स्थान अब शस्त्रीकरण ने ले लिया है, और दुनिया एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुकी है जहाँ “शांति” केवल अधिक शक्तिशाली हथियारों के साये में ही संभव मानी जा रही है.

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