Indian Navy को मिला तीसरा ASW SWC ‘मंगरोल’, तटीय इलाकों में बढ़ेगी पनडुब्बी रोधी क्षमता
कोच्चि शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) ने Indian Navy के लिए निर्मित एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (ASW SWC) ‘मंगरोल’ की डिलीवरी कर दी है. ‘मंगरोल’ आठ स्वदेशी ASW SWC की श्रृंखला का तीसरा पोत है. डिलीवरी के साथ ही भारतीय नौसेना की उथले तटीय जलक्षेत्रों में पानी के भीतर मौजूद खतरों की निगरानी और पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता को और मजबूती मिलेगी.
डिलीवरी प्रोटोकॉल पर CSL के निदेशक (ऑपरेशंस) डॉ. हरिकृष्णन एस. और ‘मंगरोल’ के नामित कमांडिंग ऑफिसर कमांडर यू. शरण कुमार ने हस्ताक्षर किए. इस अवसर पर CSL के CMD जोस वी.जे., HQWNC के CRO कमोडोर पीयूष बडोनी तथा भारतीय नौसेना और CSL के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे.
‘मंगरोल’ क्या है और इसकी खासियत क्या है?
‘मंगरोल’ को CSL ने स्वदेशी डिजाइन और निर्माण क्षमता के तहत तैयार किया है. यह Mahe-class ASW SWC परियोजना का हिस्सा है. रक्षा मंत्रालय और CSL के बीच आठ ASW SWC के निर्माण का अनुबंध अप्रैल 2019 में हुआ था. इन पोतों को भारतीय नौसेना के पुराने Abhay-class ASW corvettes को धीरे-धीरे बदलने और तटीय जलक्षेत्रों में पनडुब्बी रोधी निगरानी क्षमता बढ़ाने के लिए विकसित किया जा रहा है.
CSL के अनुसार, इस श्रेणी के पोत लगभग 78 मीटर लंबे, करीब 900 टन विस्थापन क्षमता वाले हैं और इनकी अधिकतम गति 25 नॉट है. इनकी डिजाइन में उथले पानी में पनडुब्बियों की निगरानी और पनडुब्बी रोधी अभियानों को ध्यान में रखा गया है. पोतों में स्वदेशी रूप से विकसित अत्याधुनिक सोनार प्रणालियों को एकीकृत करने की क्षमता भी है.
उथले पानी में पनडुब्बियों का शिकार
ASW SWC का मुख्य उद्देश्य तट के नजदीक और उथले समुद्री क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों तथा अन्य पानी के भीतर मौजूद खतरों का पता लगाना, उन्हें ट्रैक करना और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें निष्क्रिय करना है. ऐसे क्षेत्र पारंपरिक बड़े पनडुब्बी रोधी युद्धपोतों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं. इसलिए छोटे, तेज और विशेष रूप से ASW मिशन के लिए डिजाइन किए गए इन पोतों की भूमिका महत्वपूर्ण है.
मंगरोल से पहले ‘महे’ और ‘मालवन’

इस श्रृंखला का पहला पोत INS Mahe नवंबर 2025 में भारतीय नौसेना में कमीशन किया गया था, जबकि दूसरा पोत INS Malvan जुलाई 2026 में कमीशन हुआ. ‘मंगरोल’ इस श्रृंखला का तीसरा पोत है. CSL के मुताबिक पहले तीन पोतों को क्रमशः INS Mahe, INS Malvan और INS Mangrol नाम दिया जाना है.
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि डिलीवरी और नौसेना में कमीशनिंग एक ही प्रक्रिया नहीं हैं. मौजूदा जानकारी के अनुसार ‘मंगरोल’ की CSL से भारतीय नौसेना को डिलीवरी हुई है; इसके नौसेना में औपचारिक कमीशनिंग की तारीख अलग से घोषित की जानी होगी.
आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा

‘मंगरोल’ की डिलीवरी भारतीय नौसेना के लिए स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है. ASW SWC परियोजना में प्रमुख और सहायक उपकरणों की बड़ी संख्या स्वदेशी निर्माताओं से हासिल की जा रही है, जिससे भारत की घरेलू रक्षा उत्पादन और युद्धपोत निर्माण क्षमता को बढ़ावा मिल रहा है.
इस तरह ‘मंगरोल’ सिर्फ भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल होने वाला एक नया पोत नहीं है, बल्कि भारत की तटीय सुरक्षा, पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता और आत्मनिर्भर नौसैनिक निर्माण कार्यक्रम को आगे बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है.
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