Turkey को चेतावनी, ईस्टर्न मेडिटेरेनियन में नया पावर-ब्लॉक: नेतन्याहू की चाल और भारत के लिए इसके मायने

इजरायल-ग्रीस-साइप्रस सम्मेलन: तुर्की के खिलाफ पावर-ब्लॉक और भारत की रणनीति

Israel के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हाल ही में आयोजित इजरायल-ग्रीस-साइप्रस त्रिपक्षीय शिखर सम्मेलन का इस्तेमाल केवल कूटनीतिक मुलाकात के लिए नहीं, बल्कि Turkey और राष्ट्रपति रेसेप तैय्यिप एर्दोगन को एक रणनीतिक चेतावनी देने के लिए किया. यह सम्मेलन ईस्टर्न मेडिटेरेनियन क्षेत्र में उभरते नए पावर-अलायंस का स्पष्ट संकेत है.

इजरायल, ग्रीस और साइप्रस के नेता जेरूसलम में मिले, जहां सुरक्षा, रक्षा और क्षेत्रीय सहयोग पर जोर दिया गया. बैठक के दौरान नेतन्याहू ने यह संकेत दिया कि उन देशों के खिलाफ खतरे/दखलअंदाजी की नीति बर्दाश्त नहीं की जाएगी, जिसका व्यावहारिक संदर्भ तुर्की की बढ़ती गतिविधियों की ओर समझा जा रहा है.

Turkey क्यों निशाने पर है?

पिछले कुछ वर्षों में तुर्की ने ईस्टर्न मेडिटेरेनियन में गैस एक्सप्लोरेशन, ग्रीस और साइप्रस के समुद्री दावों को चुनौती, और क्षेत्र में सैन्य मौजूदगी बढ़ाने जैसे कदम उठाए हैं.

इजरायल, ग्रीस और साइप्रस का यह साझा मंच तुर्की को यह संदेश देता है कि क्षेत्रीय आक्रामकता को अब अकेले-अकेले नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से जवाब दिया जाएगा यह सिर्फ सम्मेलन नहीं, एक रणनीतिक संदेश था.

नेतन्याहू ने इस बैठक में जिस तरह से साझा सुरक्षा,ऊर्जा सहयोग, समुद्री सीमाओं की सुरक्षा पर जोर दिया, उससे साफ है कि यह तुर्की के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की रणनीति का हिस्सा है. यह पावर-ब्लॉक अमेरिका और यूरोप के कुछ हिस्सों के लिए भी स्वीकार्य है, क्योंकि तुर्की अब NATO के भीतर भी एक अनप्रेडिक्टेबल खिलाड़ी बन चुका है.

इजरायल-ग्रीस-साइप्रस सम्मेलन: तुर्की के खिलाफ पावर-ब्लॉक और भारत की रणनीति

भारत के लिए यह क्यों अहम है?

1 भारत-इजरायल-ग्रीस स्ट्रैटेजिक ट्रायंगल

भारत पहले ही इजरायल के साथ रक्षा, ड्रोन, मिसाइल और इंटेलिजेंस सहयोग और ग्रीस के साथ नौसैनिक अभ्यास और एयरफोर्स सहयोग बढ़ा चुका है.

यह नया इजरायल-ग्रीस-साइप्रस ब्लॉक भारत के लिए एक नैचुरल स्ट्रैटेजिक एक्सटेंशन बनता है, खासकर तब जब भारत भूमध्य सागर तक अपनी समुद्री कूटनीति फैलाना चाहता है.

2 तुर्की-पाकिस्तान धुरी को बैलेंस करने का मौका

तुर्की खुलकर पाकिस्तान का समर्थन, कश्मीर मुद्दे पर भारत-विरोधी बयान और पाकिस्तान को सैन्य सहयोग देता रहा है. ऐसे में तुर्की के खिलाफ खड़े देशों के साथ भारत का अप्रत्यक्ष तालमेल भारत के लिए जियो-पॉलिटिकल लाभ पैदा करता है.

3- एनर्जी सिक्योरिटी और ट्रेड रूट्स

ईस्टर्न मेडिटेरेनियन में प्राकृतिक गैस, समुद्री ट्रेड रूट्स भारत की लॉन्ग-टर्म एनर्जी और ट्रेड रणनीति से जुड़े हैं. अगर यह क्षेत्र तुर्की के एकतरफा प्रभाव में जाता है, तो भारत के लिए यह भविष्य में जोखिम भरा हो सकता है. नया पावर-ब्लॉक क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देता है, जो भारत के हित में है.

4 IMEC कॉरिडोर से जुड़ाव

भारत-मिडल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) में इजरायल, ग्रीस, यूरोप की भूमिका अहम है.

तुर्की, IMEC का हिस्सा नहीं है और इस प्रोजेक्ट का आलोचक भी रहा है. ऐसे में यह त्रिपक्षीय गठजोड़ IMEC को अप्रत्यक्ष मजबूती देता है और भारत को रणनीतिक बढ़त.

नेतन्याहू का यह कदम सिर्फ तुर्की को चेतावनी नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि ईस्टर्न मेडिटेरेनियन अब नए कोल्ड-वॉर जैसे पावर बैलेंस की ओर बढ़ रहा है.

भारत के लिए यह एक अवसर है- सही पक्षों के साथ खड़े होकर तुर्की-पाकिस्तान धुरी को संतुलित करने और भूमध्य सागर तक अपनी रणनीतिक मौजूदगी मजबूत करने का.

इजरायल-ग्रीस-साइप्रस सम्मेलन में दिया गया संदेश तुर्की के लिए भले चेतावनी हो, लेकिन भारत के लिए यह एक रणनीतिक अवसर है. बदलती वैश्विक राजनीति में भारत के लिए ऐसे पावर-ब्लॉक्स के साथ जुड़ाव भविष्य की सुरक्षा, ऊर्जा और कूटनीति तीनों के लिए अहम साबित हो सकता है.

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