DRDO ने 0.17 सेकंड में विंग फोल्डिंग सिस्टम का सफल परीक्षण, फाइटर जेट्स बनेंगे Shape-Shifter
भारत ने लड़ाकू विमानों की तकनीक में एक बड़ा कदम आगे बढ़ाते हुए विंग-फोल्डिंग और मॉर्फिंग-विंग मैकेनिज़्म का सफल परीक्षण पूरा कर लिया है. DRDO ने यह हाई-स्पीड ट्रायल रॉकेट-स्लेज प्लेटफॉर्म पर किया, जिसमें पंखों को सिर्फ 0.17 सेकंड में मोड़े जाने की क्षमता प्रदर्शित की गई.
परीक्षण चंडीगढ़ स्थित DRDO की टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (TBRL) में किया गया, जहां तेज़ गति, शॉक-लोड, एरो-स्ट्रेस और अचानक दिशा-परिवर्तन जैसे वास्तविक उड़ान-परिस्थितियों का निर्माण किया गया. इस परीक्षण के बाद भारत अब उन देशों की सूची में शामिल हो गया है जो फाइटर-जेट में स्मार्ट-एयरफ्रेम टेक्नोलॉजी विकसित कर रहे हैं.
DRDO की यह तकनीक क्यों अहम है?
यह तकनीक विशेष रूप से नौसेना और कैरियर-बेस्ड फाइटर जेट्स के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
जहाँ जहाज़ पर जगह सीमित होती है, वहां पंखों को तेज़ी से मोड़ने की क्षमता स्टोरेज क्षमता बढ़ाती है, विमान को तेजी से तैनात करने में सहायता देती है, और मिशन लोडिंग में समय घटाती है.
भविष्य में यह तकनीक हवा में ही पंखों का आकार बदलकर ईंधन दक्षता, रडार सिग्नेचर, एग्रेसिव टर्निंग (Dogfight Manoeuvring), तेज़ Take-Off जैसी क्षमताओं का रूपांतरण भी कर सकती है.
कब और कहाँ है इसका उपयोग?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक निम्न कार्यक्रमों का हिस्सा हो सकती है—
- TEDBF (Twin Engine Deck-Based Fighter)
- भविष्य का 6th-Gen भारतीय फाइटर
- उन्नत AEW प्लेटफ़ॉर्म
- स्वदेशी UCAV प्रोग्राम
विशेष रूप से नौसेना के अगली-पीढ़ी के जेट के लिए यह आवश्यक मानी जा रही है.
आगे का रोडमैप
DRDO अब एयर-फ्लाइट ट्रायल, मल्टी-फोल्ड endurance cycle, vibration-absorption test, avionics integration जैसे चरणों पर काम करेगा.
रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यह तकनीक आने वाले वर्षों में भारतीय फाइटर-जेट्स को “शेप-शिफ्टिंग प्लेटफॉर्म” में बदल देगी—यानी मिशन-के-अनुसार उड़ान के दौरान जेट अपना स्वरूप बदल सकेगा.
भारत ने रक्षा-तकनीक में जिस गति से छलांग लगाई है, वह आने वाले दशक में देश को उन्नत एयर-कॉम्बैट क्षमता और पूर्ण स्वदेशीकरण की दिशा में निर्णायक लाभ दे सकती है.
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