ग्रेटर इजरायल प्लान क्या है? क्यों हासिल है अमेरिकी समर्थन?
मिडिल ईस्ट में ‘ग्रेटर इजरायल‘ को लेकर हमेशा खौफ रहता है. इजरायल के कई नेता इसके प्रति संकल्पित दिखाई देते हैं. उनका अटूट विश्वास है कि एक न एक दिन यह होकर रहेगा.
आपके मन में यह जरूर आया होगा कि आखिर ग्रेटर इजरायल क्या है और मिडिल ईस्ट के देश इसको लेकर क्यों खौफ में रहते है.
ग्रेटर इजरायल का मतलब उस बड़े इलाके से है, जहां तक कभी प्राचीन यहूदी राज्य हुआ करता था. इसे मध्य पूर्व के लिए जायोनिस्ट (यहूदीवादी) विस्तारवादी योजना भी कहा जाता है. 19वीं सदी में यहूदीवाद की स्थापना करने वाले थियोडोर हर्जेल ने इसकी अवधारणा दी थी.
इसमें मिस्र की नील नदी से यूफ्रेट्स और मदीना से लेकर लेबनान तक का इलाका शामिल है. यानी इस क्षेत्र में मिस्र, लेबनान, सीरिया, इराक, सऊदी अरब, पूरा जॉर्डन और कब्जे वाला फिलिस्तीनी क्षेत्र शामिल है.
यहूदीवाद, यहूदियों का तथा यहूदी संस्कृति का राष्ट्रवादी राजनैतिक आन्दोलन है जो इसराइल के ऐतिहासिक भूभाग में यहूदी देश की पुनर्स्थापना का समर्थन करता है.
जायोनिज्म का आरम्भ मध्य एवं पूर्वी यूरोप में 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ. यह यूरोप के सिमेटिक विरोधी राष्ट्रवादी आन्दोलनों के प्रतिक्रियास्वरूप एक राष्ट्रीय पुनरुज्जीवन आन्दोलन के रूप में शुरू हुआ. यहूदीवाद आंदोलन का मुख्य उद्देश्य फिलिस्तीन में यहूदीकरण तथा यहूदीबाद का विस्तार करना, जिसके लिए इसकी विश्व में बहुत आलोचना हो चुकी है. हालांकि इस आन्दोलन के अधिकांश नेताओं ने फिलिस्तीन के अन्दर अपना देश बनाने का लक्ष्य स्वीकार किया. फिलिस्तीन उस समय उसमानी साम्राज्य के अधीन था.
इजरायली सेना ने अल्फा लाइन को किया पार
यही वजह है कि समय-समय पर इजरायल में इसे लेकर चर्चाएं होती रही हैं. क्योंकि तुर्की के साठगांठ और अमेरिका-इजरायल के परोक्ष सहमति से सीरिया में बशर अल-असद के पतन की पृष्ठभूमि तैयार की गई और इस दुःस्वप्न के साकार होने के बाद ही एक बार फिर से ‘ग्रेटर इजरायल‘ की चर्चा तेज हो गई. क्योंकि बिना कोई समय गंवाए इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के आदेश के बाद इजरायली सेना ने अल्फा लाइन को पार कर लिया और सीरिया के एक बड़े हिस्से पर कब्जा जमा लिया है.
इस विशाल इलाके में अमेरिकी प्रभुत्व होने के कारण इजरायल को यह स्वप्न साकार करने में कोई परेशानी नहीं आएगी, बल्कि इस स्वप्न के साकार होते ही उसकी सैन्य ताकत और क्षेत्रीय रणनीतिक प्रभुत्व क्षमता में और भी इजाफा हो जाएगा.
इजरायली राजनीति में ग्रेटर इजरायल की बात कोई नई बात नहीं है. इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री नेफ्टाली बेनेट ने ईरान के हमले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि इजराइल के पास बीते 50 सालों में यह पहला मौका है जब वह मिडिल ईस्ट की तस्वीर बदल सके.
मिडिल ईस्ट मॉनिटर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2024 को इजरायली राजनेता एवी लिपकिन (Avi Lipkin) ने कहा था कि, “आखिरकार हमारी सीमाएं लेबनान से सऊदी अरब के ग्रेट डेजर्ट तक फैलेंगी. फिर भूमध्य सागर से फरात नदी (इराक) तक. और फरात के दूसरी तरफ कौन है? कुर्द! और वे हमारे दोस्त हैं.”
वहीं, लिपकिन ने आगे कहा कि, “इसलिए हमारे पीछे भूमध्य सागर है और हमारे सामने कुर्द हैं, लेबनान है, जिसे वास्तव में इजरायल की छ्त्रछाया की आवश्यकता है. मेरा मानना है कि फिर हम मक्का, मदीना और माउंट सिनाई पर कब्ज़ा करेंगे, और उन जगहों को शुद्ध करेंगे.”
ग्रेटर इजराइल के लिए रिवर टू रिवर का नारा
जिस तरह आजाद फिलिस्तीन के लिए ‘रिवर टू सी’ का नारा दिया जाता है, उसी तरह ग्रेटर इजराइल के लिए रिवर टू रिवर का नारा दिया जाता है.
कई इतिहासकारों तथा अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषकों का भी कहना है कि यही वजह है कि इज़राइल धीरे-धीरे और रणनीतिक रूप से अपने पड़ोसियों, विशेष रूप से फिलिस्तीन से अधिक से अधिक भूमि हड़प रहा है. कई विश्लेषक यहां तक कहते हैं कि ग्रेटर इजरायल पूरी तरह से यहूदी प्लान नहीं है, बल्कि इसके पीछे अमेरिका की सोच काम कर रही है, जिसका उद्येश्य मध्य पूर्व में अपने आधिपत्य का विस्तार करना है.
फिलहाल इजरायल एक साथ कई मोर्चां पर युद्ध लड़ रहा है. जो बाइडेन के साथ इजरायल का संबंध उतना अच्छा नहीं रहा है. ऐसे में ट्रंप का दोबारा सत्ता में आना इजरायल के लिए फायदेमंद है. लेकिन फिर भी इजरायल वर्तमान परिस्थितियों में ग्रेटर इजरायल के अपने लक्ष्य को प्राप्त करता हुआ नजर नहीं आ रहे है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि इजरायल इसके लिए कोशिश करता रहेगा.
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